Class 12 Political Science: Chapter 2 (International)
कक्षा 12 राजनीति विज्ञान (Political Science) के अध्याय 2 “सत्ता के समकालीन केंद्र” के 40 सबसे महत्वपूर्ण MCQs उत्तर सहित पढ़ें। बोर्ड परीक्षा 2026 के लिए उपयोगी।
Class 12 Political Science: Chapter 2 (International)
Class 12 Political Science: Chapter 2 (International) (समीकृत अध्याय: ‘सत्ता के समकालीन केंद्र’) की यह विस्तृत और SEO-अनुकूलित सारांश (Summary) प्रस्तुत है।
इस नोट्स-आधारित सारांश में Class 12 Political Science: Chapter 2 (International) के सभी प्रमुख संगठनों, देशों, ऐतिहासिक पड़ावों और भारत-चीन संबंधों को स्पष्ट रूप से कवर किया गया है।
अध्याय का परिचय (Overview)
1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व राजनीति में दो-ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमरीकी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए ‘सत्ता के वैकल्पिक/समकालीन केंद्र’ उभर कर सामने आए। Class 12 Political Science: Chapter 2 (International) मुख्य रूप से यूरोपीय संघ (EU), आसियान (ASEAN), चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे वैश्विक और क्षेत्रीय शक्ति-केंद्रों के विकास तथा उनकी भूमिका का विश्लेषण करता है।
1. यूरोपीय संघ (European Union – EU)
Class 12 Political Science: Chapter 2 (International)
दूसरे विश्वयुद्ध (1945) के बाद यूरोपीय देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन और आपसी दुश्मनों को खत्म करने के लिए एकीकरण का रास्ता चुना।
- माशाॅल योजना (1948): अमेरिका ने मार्शल योजना के तहत पश्चिमी यूरोप के देशों को आर्थिक मदद दी, जिसके तहत 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
- मास्ट्रिस्ट संधि (1992): 1992 में मास्ट्रिस्ट संधि पर हस्ताक्षर के साथ औपचारिक रूप से यूरोपीय संघ (EU) की स्थापना हुई।
- विशेषताएँ: यूरोपीय संघ का अपना झंडा, राष्ट्रगान, स्थापना दिवस और साझी मुद्रा (यूरो) है।
- प्रभाव:
- वर्ष 2024 में इसका GDP लगभग 19.35 खरब डॉलर दर्ज हुआ।
- इसके पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना और लगभग 335 परमाणु हथियार (फ्रांस) हैं।
- विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमेरिका से तीन गुनी अधिक है।
2. दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN)
दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों ने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए आसियान का गठन किया।
- बैंकॉक घोषणा (1967): 1967 में 5 संस्थापक देशों (इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड) ने बैंकॉक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करके आसियान (ASEAN) की स्थापना की। बाद में 5 और देश जुड़ने से सदस्य संख्या 10 हो गई।
- आसियान शैली (ASEAN Way): अनौपचारिक, टकराव-रहित और सहयोगात्मक मेल-मिलाप की नीति को ‘आसियान शैली’ कहा जाता है।
- आसियान के 3 मुख्य स्तंभ (2003):
- आसियान सुरक्षा समुदाय
- आसियान आर्थिक समुदाय
- आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय
- आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF – 1994): सदस्य देशों की सुरक्षा और विदेश नीतियों में तालमेल बनाने के लिए 1994 में ARF की स्थापना की गई।
- 3. चीनी अर्थव्यवस्था का उत्थान
1949 में माओ के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति के बाद चीन ने सोवियत मॉडल अपनाया, लेकिन 1970 के दशक के बाद चीन ने अपनी आर्थिक नीतियों में बड़ा बदलाव किया:
- खुले द्वार की नीति (Open Door Policy – 1978): नेता देंग श्याओपेंग ने 1978 में ‘ओपन डोर’ की नीति अपनाई, जिससे विदेशी पूंजी और तकनीक को प्रोत्साहन मिला।
- चरणबद्ध सुधार (No Shock Therapy): चीन ने ‘शॉक थेरेपी’ की जगह चरणबद्ध तरीके से सुधार किए — 1982 में कृषि का निजीकरण और 1998 में उद्योगों का निजीकरण किया गया।
- विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ): विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए SEZ का निर्माण किया गया।
- WTO की सदस्यता: चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल हुआ।
4. भारत और चीन के संबंध
Class 12 Political Science: Chapter 2 (International) में भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों के उतार-चढ़ाव को विस्तार से रेखांकित किया गया है:
- शुरुआती दौर: स्वतंत्रता के बाद “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा लोकप्रिय हुआ।
- तनाव के मुद्दे: 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर नियंत्रण, सीमा विवाद (अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख का अक्साई चिन क्षेत्र) के कारण 1962 का भारत-चीन युद्ध हुआ।
- संबंधों में सुधार:
- 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों में नया मोड़ आया।
- भारत की ‘Look East’ (1991) और ‘Act East’ (2014) नीतियों से पूर्वी एशियाई देशों के साथ आर्थिक जुड़ाव बढ़ा।
- 1992 में द्विपक्षीय व्यापार 33.8 करोड़ डॉलर था जो 2017 में बढ़कर 84 अरब डॉलर हो गया।
- मौजूदा चुनौतियाँ: सीमा-विवाद, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), और UN में आतंकवाद विरोधी प्रस्तावों पर चीन द्वारा पाकिस्तान का समर्थन।
5. सत्ता के नए केंद्र: जापान और दक्षिण कोरिया
- जापान: विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल है। इसके प्रसिद्ध ब्रांड्स जैसे सोनी, पैनासोनिक, होंडा और टोयोटा वैश्विक स्तर पर मशहूर हैं। यह G-7 का सदस्य है और UN बजट में योगदान देने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है।
- दक्षिण कोरिया: 1960 से 1980 के बीच दक्षिण कोरिया के अभूतपूर्व आर्थिक विकास को “हान नदी पर चमत्कार” (Miracle on the Han River) कहा जाता है। सैमसंग, एलजी और हुंडई जैसे कोरियाई ब्रांड वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
Class 12 Political Science: Chapter 2 (International) हमें यह समझने में मदद करता है कि विश्व राजनीति अब केवल एक महाशक्ति के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, बल्कि क्षेत्रीय संगठन (EU, ASEAN) और उभरती हुई आर्थिक शक्तियां (चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया) मिलकर बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण कर रही हैं।
Important Question
1.बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs): Class 12 Political Science: Chapter 2 (International)
1. यूरोपीय संघ (EU) की स्थापना किस संधि के तहत हुई थी?
(क) वर्साय की संधि
(ख) मास्ट्रिस्ट संधि
(ग) बैंकॉक घोषणा
(घ) पेरिस संधि
उत्तर: (ख) मास्ट्रिस्ट संधि (1992)
2. दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन (ASEAN) किस घोषणा पत्र द्वारा स्थापित हुआ था?
(क) बैंकॉक घोषणा पत्र
(ख) दिल्ली घोषणा पत्र
(ग) टोक्यो घोषणा पत्र
(घ) जकार्ता घोषणा पत्र
उत्तर: (क) बैंकॉक घोषणा पत्र (1967)
3. चीन ने ‘खुले द्वार की नीति’ (Open Door Policy) कब और किसके नेतृत्व में अपनाई?
(क) 1972, माओ
(ख) 1978, देंग श्याओपेंग
(ग) 1992, शी जिनपिंग
(घ) 2001, झांग जेमिन
उत्तर: (ख) 1978, देंग श्याओपेंग
4. किस देश के आर्थिक विकास को “हान नदी पर चमत्कार” (Miracle on the Han River) कहा जाता है?
(क) जापान
(ख) चीन
(ग) दक्षिण कोरिया
(घ) सिंगापुर
उत्तर: (ग) दक्षिण कोरिया
5. आसियान क्षेत्रीय मंच (ARF) की स्थापना किस वर्ष की गई थी?
(क) 1967
(ख) 1992
(ग) 1994
(घ) 2003
उत्तर: (ग) 1994
2.लघु-उत्तरीय प्रश्न और उत्तर (Short Answer Questions): Class 12 Political Science: Chapter 2 (International)
प्र. 1. ‘आसियान शैली’ (ASEAN Way) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: आसियान के सदस्य देशों के बीच अनौपचारिक, टकराव-रहित और सहयोगात्मक मेल-मिलाप के तरीके को ‘आसियान शैली’ कहा जाता है। इसमें राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करते हुए बिना किसी सैन्य दबाव के सहमति से निर्णय लिए जाते हैं।
प्र. 2. चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था के सुधार के लिए ‘शॉक थेरेपी’ की जगह कौन-सा तरीका अपनाया?
उत्तर: चीन ने सोवियत संघ की तरह एकाएक ‘शॉक थेरेपी’ न अपनाकर चरणबद्ध तरीके से अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार किए। उसने 1982 में कृषि का निजीकरण किया, 1998 में उद्योगों का निजीकरण किया और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) स्थापित किए।
प्र. 3. यूरोपीय संघ (EU) को एक प्रभावशाली क्षेत्रीय संगठन बनाने वाले दो मुख्य कारण लिखिए।
उत्तर:
- आर्थिक ताकत: यूरोपीय संघ की साझी मुद्रा ‘यूरो’ और लगभग 19.35 खरब डॉलर की GDP इसे एक बड़ी आर्थिक शक्ति बनाती है।
- सैन्य व राजनीतिक प्रभाव: यूरोपीय संघ के पास विशाल साझी सेना और परमाणु हथियार क्षमता (फ्रांस) है, जिससे यह वैश्विक राजनीति पर गहरा असर डालता है।
3.दीर्घ-उत्तरीय अभ्यास प्रश्न (Long Answer Questions): Class 12 Political Science: Chapter 2 (International)
प्र. 1. 1962 के युद्ध के बाद भारत और चीन के संबंधों में सुधार के प्रमुख पड़ावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर दिशा-निर्देश:
- 1988 में राजीव गांधी की ऐतिहासिक चीन यात्रा।
- सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए हुए समझौते और द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि।
- भारत की ‘Look East’ (1991) और ‘Act East’ (2014) नीतियां।
- वर्तमान स्थिति: बढ़ते व्यापारिक संबंधों के बावजूद सीमा-विवाद (जैसे लद्दाख/अरुणाचल) और चीन-पाकिस्तान गलियारा (CPEC) जैसे तनावपूर्ण मुद्दे।
प्र. 2. आसियान (ASEAN) के तीनों स्तंभों का उल्लेख करते हुए इसके प्रमुख उद्देश्यों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर दिशा-निर्देश:
- तीन स्तंभ: आसियान सुरक्षा समुदाय, आसियान आर्थिक समुदाय, और आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय।
- उद्देश्य: दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में आर्थिक विकास में तेजी लाना, क्षेत्रीय शांति व स्थायित्व बनाए रखना, तथा विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना।
1962 के भारत-चीन युद्ध के मुख्य कारणों और भारत पर इसके दीर्घकालिक परिणामों का विस्तृत विश्लेषण करें।
1962 का भारत-चीन युद्ध आधुनिक भारत के इतिहास और उसकी विदेश नीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मोड़ था। 1950 के दशक में “हिंदी-चीनी भाई-भाई” के नारों के बावजूद, दोनों देशों के बीच उपजे मतभेदों ने अंततः 20 अक्टूबर 1962 को एक पूर्ण सैन्य संघर्ष का रूप ले लिया।
1. युद्ध के मुख्य कारण (Primary Causes)
1962 के युद्ध के पीछे केवल एक तात्कालिक घटना नहीं, बल्कि कई राजनीतिक, भौगोलिक और रणनीतिक कारण जिम्मेदार थे:
- अस्पष्ट सीमा विवाद (Boundary Dispute):
- अक्साई चिन (पश्चिम क्षेत्र): चीन ने लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र पर अपना दावा ठोका और 1950 के दशक में चुपके से वहाँ से तिब्बत को शिनजियांग से जोड़ने वाली एक सामरिक सड़क (राष्ट्रीय राजमार्ग 219) बना ली। भारत को इसका पता बाद में चला, जिससे गहरा कूटनीतिक तनाव पैदा हुआ।
- मैकमोहन रेखा (पूर्वी क्षेत्र): चीन ने अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन NEFA) में ब्रिटिश काल में तय की गई मैकमोहन रेखा को औपनिवेशिक विरासत बताकर मानने से इनकार कर दिया और इस पूरे क्षेत्र को अपना हिस्सा बताया।
- तिब्बत का मुद्दा और दलाई लामा को शरण (1959):
- 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण कर लेने के बाद वहाँ स्वायत्तता को लेकर असंतोष बढ़ा।
- 1959 में जब तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने अपने समर्थकों के साथ भारत से राजनीतिक शरण मांगी, तो भारत सरकार ने उन्हें शरण दे दी। चीन ने इसे अपने आंतरिक मामलों में भारत का सीधा हस्तक्षेप माना और इसे शत्रुतापूर्ण कदम समझा।
- भारत की ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ (Forward Policy):
- सीमा पर चीनी अतिक्रमण को रोकने के लिए भारत ने सीमावर्ती इलाकों में छोटी-छोटी सैन्य चौकियां स्थापित करने की नीति अपनाई। चीन ने इस कदम को अपनी संप्रभुता पर हमला माना और इसे युद्ध के लिए उकसावे के रूप में देखा।
2. भारत पर दीर्घकालिक परिणाम (Long-term Impact on India)
1962 के युद्ध में भारत को भारी सैन्य और कूटनीतिक पराजय का सामना करना पड़ा, जिसके भारतीय राजनीति और विदेश नीति पर गहरे और लंबे समय तक रहने वाले प्रभाव पड़े:
- सैन्य नीति और रक्षा बजट का पुनर्गठन:
- इस युद्ध ने भारत को अपनी सैन्य कमियों और बुनियादी ढांचे की लाचारी का अहसास कराया।
- इसके बाद भारत ने अपनी रक्षा नीति में आमूल-चूल बदलाव किए, सैन्य बजट में भारी वृद्धि की और थल सेना व वायु सेना का आधुनिकरण शुरू किया।
- विदेश नीति में यथार्थवाद (Realism in Foreign Policy):
- युद्ध से पहले भारत की विदेश नीति आदर्शवाद और ‘गुटनिरपेक्षता’ पर अत्यधिक आधारित थी। युद्ध के बाद भारत ने अधिक व्यावहारिक और यथार्थवादी विदेश नीति अपनाई।
- भारत को यह समझ में आया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल नैतिक सिद्धांतों के बल पर सीमाओं की सुरक्षा नहीं की जा सकती।
- आंतरिक राजनीति पर प्रभाव:
- तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ‘पंचशील’ और शांतिवादी नीति की देश के भीतर तीखी आलोचना हुई।
- नेहरू सरकार को देश के इतिहास में पहली बार संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। तत्कालीन रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।
- चीन-पाकिस्तान धुरी (China-Pakistan Axis):
- 1962 के युद्ध के बाद चीन और पाकिस्तान एक-दूसरे के करीब आ गए। 1963 में पाकिस्तान ने पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) का शक्सगाम घाटी क्षेत्र चीन को सौंप दिया, जिससे भारत के खिलाफ दोहरे मोर्चे (Two-Front Threat) की सुरक्षा चुनौती खड़ी हो गई।
- उत्तर-पूर्व भारत का एकीकरण और विकास:
- युद्ध के बाद भारत सरकार ने उत्तर-पूर्वी राज्यों (विशेषकर अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड) की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास पर विशेष ध्यान देना शुरू किया ताकि क्षेत्रीय एकीकरण को मजबूत किया जा सके।
निष्कर्ष
1962 का युद्ध भारत के लिए एक बड़ा झटका था, लेकिन इसने देश को अपनी रणनीतिक और सैन्य क्षमताओं को नए सिरे से गढ़ने का अवसर भी दिया। इसी का नतीजा था कि भारत ने 1965 और 1971 के युद्धों में अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाया।
1954 में भारत और चीन के बीच हुए ‘पंचशील समझौते’ के 5 सिद्धांत क्या थे और यह क्यों असफल रहा?
29 अप्रैल 1954 को भारत और चीन (तिब्बत क्षेत्र) के बीच हुए ‘पंचशील समझौते’ (Panchsheel Agreement) पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाई ने हस्ताक्षर किए थे।
यह समझौता दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और मजबूत कूटनीतिक संबंधों की नींव के रूप में तैयार किया गया था।
पंचशील समझौते के 5 सिद्धांत (Five Principles)
पंचशील का अर्थ है “पाँच आचरण या नियम”। इसमें निम्नलिखित पाँच प्रमुख सिद्धांत शामिल थे:
- एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का पारस्परिक सम्मान करना।
- एक-दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्रवाई (हमला) न करना।
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
- समानता और परस्पर लाभ की भावना रखना।
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का पालन करना।
पंचशील समझौता क्यों असफल रहा? (Reasons for Failure)
यह समझौता सैद्धांतिक रूप से बहुत मजबूत था, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर यह असफल साबित हुआ। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- 1. तिब्बत पर चीनी नियंत्रण और दलाई लामा को शरण (1959): पंचशील समझौते के तहत भारत ने तिब्बत पर चीन की संप्रभुता को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, जब 1959 में चीन ने तिब्बत में धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का दमन किया, तो दलाई लामा भागकर भारत आ गए। भारत द्वारा दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना चीन को रास नहीं आया और उसने भारत पर “आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने” के सिद्धांत के उल्लंघन का आरोप लगाया।
- 2. भारत-चीन सीमा विवाद: चीन ने पंचशील के सिद्धांतों के विपरीत भारत के पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश/NEFA) और पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख का अक्साई चिन) की सीमाओं को मानने से इनकार कर दिया। चीन ने अक्साई चिन क्षेत्र में सड़क निर्माण कर भारत की क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन किया।
- 3. 1962 का भारत-चीन युद्ध: 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर अचानक सैन्य आक्रमण कर दिया। पंचशील का सबसे पहला और मुख्य सिद्धांत “अनाक्रमण” (एक-दूसरे पर हमला न करना) था। चीन के इस आक्रामक कदम ने पंचशील की भावना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
- 4. कूटनीतिक विश्वासघात और आदर्शवाद: भारतीय नेतृत्व ने चीन के साथ संबंधों में अत्यधिक ‘आदर्शवाद’ अपनाया और यह मान लिया कि चीन कभी हमला नहीं करेगा। इसके विपरीत, चीन ने रणनीतिक और व्यावहारिक (Realpolitik) दृष्टिकोण अपनाया, जिससे पंचशील समझौता मात्र कागजी बनकर रह गया।
निष्कर्ष
पंचशील समझौता भारत की शांतिप्रिय विदेश नीति का प्रतीक था, लेकिन चीन के सीमा विस्तार और 1962 के आक्रमण ने इसे ऐतिहासिक रूप से असफल बना दिया। इसके बाद भारत को अपनी विदेश नीति में आदर्शवाद को छोड़कर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने पर मजबूर होना पड़ा।